वो अजनबी - कौन था वो ?

हम चार लोग थे जो साथ मैं रहना चाहते थे क्योंकि अकेले रहकर बोर हो चुके थे|  मैंने और मेरी दोस्त ने नये फ्लैट की तलाश शुरू कर दी|  मेरा नाम रोज़ा और मेरी दोस्त का नाम अमिया है | 

सर्दियों का मौसम है| चारों ओर कड़कड़ाती ठंड है सड़कें सफ़ेद चादर जैसे बर्फ से ढकी हुई है | मैंने अपने फ्लैट की खिड़की से बाहर झाँक कर देखा तो एक युवक नज़र आया जो मेरी तरफ इक टक देखे जा रहा था | मेरी नज़रें उसे घूर रही थी 

मैंने अपनी चाय के दो घूंट पिए और उसे देखते हुए खिड़की बंद कर दी | 

तभी दूसरे कमरे से फ़ोन की घंटी बजी और मेरा ध्यान उस तरफ गया | मैं तेज क़दमों से फ़ोन की तरफ बढ़ी 

फ़ोन उठा के कान से लगाया ही था की दूसरी तरफ से हसने की आवाज़ आयी | 

अरे रूही कुछ बोलती क्यों नहीं , दूसरी तरफ से आवाज़ आयी | 

" माफ़ कीजियेगा , मगर आप हैं कौन और मेरा नाम कैसे जानते हैं ? " मैंने ऊँचे स्वर मे बोला ! 

" अरे रूही तुम मुझे भूल गयी , पहचाना नहीं ?" , दूसरी तरफ से आवाज़ आयी | 

" मैं सोहन , हम साथ मैं कॉलेज मैं पड़ते थे ", 

" ओह | अच्छा सोहन " 

मैंने खुशी से चहचाते हुए बोला | 

हमारी बातचीत कुछ देर तक यूँही चलती रही | मैंने 
उसके परिवार के बारे मैं पूछा तो पता चला उसकी अभी अभी ही शादी हुई है | मैं सोहन को घूमने आने कहकर कर फ़ोन काट दिया | 

शाम हो चुकी थी | खिड़की खोलकर बहार झाँका तो घबरा गयी क्योंकि वो आदमी अभी भी वही खड़े हो कर मुझे इक टक घूर रहा था | 

मैंने हाथ हिलाते हुए उसकी और इशारा किया तो वो वहां से पीछे मुड कर चला गया | मैं उसे ऐसे ही लगातार देखती रही जब तक की वो मेरी आँखों से ओझल न हो गया | मैं घबराने के साथ साथ सोच मैं पड़ गयी की आखिर कौन था वो युवक जो मेरी तरफ इतनी देर से घूरे जा रहा था वो भी इतनी भरी ठंड में | 

मुझे लिखने का काफी शोक है तो सोचा अपनी किताब ही क्यों ना पूरी लिख ली जाए | आखिर कार इतनी मेहनत से लिखी है | 

लिखते - लिखते मेरे जहन में वो युवक दुबारा आया | घुंगराले बाल जो की उसके माथे से सटे हुए , सफ़ेद गोरा रंग , लम्बी कद काठी और आँखों में अजीब सी चमक, 
अजनबी होने के बावजूद काफी आकर्षक लगा | 

मैंने अपना ध्यान उस पर से हटाया और किताब पूरी की | इसकी खुशी मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रही थी इक मुस्कान के तोर पर | पिछले ही महीने मुझे ये किताब को छपवाने का मौका मिला | 

कम से कम अब मेरी मेहनत रंग लाएगी | वैसे तो मुझे कॉलेज मैं कवितायेँ लिखने और सुनाने का बहुत शोक था मगर कभी जायदा उसके बारे मैं सोचा नहीं | 

मेरे घर से कुछ दूरी पे ही शहर की सबसे बड़ी लाइब्रेरी है जहाँ जाकर इस शान दार जाड़े के मौसम में पास की दुकान से कुलड़ वाली चाय की चुसकी लेते हुए और लाइब्रेरी के इक तरफ़ा सुकून भरे कोने वाली जगह पर बैठ कर किताब पड़ने मैं बड़ा मजा आता है | वहीं से मुझे किताब लिखने का शोख धीरे - धीरे चढ़ने लगा था | 

कौन था वो युवक जो मुझे इक टक खिड़की से बाहर घूरे जा रहा था और क्या मुझे सच मैं उस से डरना चाइये ? 
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